भाग तीसरा
अपना नाम सुनकर लाजवंती असमंजस मे पड़ गई, और उसके कदम ठहर गए| कुछ भी सूझ नही रहा था | गर्मी में भी वह काँप रही थी| कानो मे शोर , ह्रदय मे बवंडर, दीमाग मे सुन्नपन, लाजवंती की हालत यूँ के काटो तो खून नही | कहीं अंदर से उसकी अन्तरात्मा ने उसे भाग जाने का निर्देश दिया , अब रुकी तो फिर कभी जा न पाएगी, पर हठीले पाँव चलने का नाम नही ले रहे थे |
छोटे ठाकुर करीब आए, लाजवंती की साँस थम गई| उसके कानो के पास, हल्की आवाज़ मे, प्रीति भरे स्वरों में, वह बोला, “प्यार होके रहेगा”
उसने तो फुसफुसाया था, पर लाजवंती को लगा जैसे सारे रेगिस्तान ने सुन लिया| एक एक शब्दांश था कोमल फूल-सा, पर मन मे गढ रहा था शूल सा| जब सहरा पे बारिश की पहली बूँद गिरती है तो कड़कड़ाती है, वैसी हालत लाजवंती की हुई| दोनो पीले मरूस्थल के बीच, गर्म हवा के आँचल मे ढके, यूँ तो कुछ क्षण ही खड़े थे, पर लाजवंती को लगा के एक युग बीत गया हो| रेत की तरह वह भी चारो दिशा फैल गई|
