Archive for the ‘Uncategorized’ Category

Tapish

April 21, 2006

भाग तीसरा

अपना नाम सुनकर लाजवंती असमंजस मे पड़ गई, और उसके कदम ठहर गए| कुछ भी सूझ नही रहा था | गर्मी में भी वह काँप रही थी| कानो मे शोर , ह्रदय मे बवंडर, दीमाग मे सुन्नपन, लाजवंती की हालत यूँ के काटो तो खून नही | कहीं अंदर से उसकी अन्तरात्मा ने उसे भाग जाने का निर्देश दिया , अब रुकी तो फिर कभी जा न पाएगी, पर हठीले पाँव चलने का नाम नही ले रहे थे |

छोटे ठाकुर करीब आए, लाजवंती की साँस थम गई| उसके कानो के पास, हल्की आवाज़ मे, प्रीति भरे स्वरों में, वह बोला, “प्यार होके रहेगा”

उसने तो फुसफुसाया था, पर लाजवंती को लगा जैसे सारे रेगिस्तान ने सुन लिया| एक एक शब्दांश था कोमल फूल-सा, पर मन मे गढ रहा था शूल सा| जब सहरा पे बारिश की पहली बूँद गिरती है तो कड़कड़ाती है, वैसी हालत लाजवंती की हुई| दोनो पीले मरूस्थल के बीच, गर्म हवा के आँचल मे ढके, यूँ तो कुछ क्षण ही खड़े थे, पर लाजवंती को लगा के एक युग बीत गया हो| रेत की तरह वह भी चारो दिशा फैल गई|

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Future Testing

April 21, 2006

Testing again :P Seeing if ‘future’ posting works or not…typing this on 20th April but publishing it for 21st date…dekho…

Song Playing Right Now: Lata Mangeshkar, Manna Dey:Woh Chand Muskaya; From Aakhri Dao [03:16]

Tapish

April 20, 2006

भाग दूसरा

लाजवंती तब तक भागती रही जब तक वह अपने घर की दहलीज़ तक नही पहुँची| उसकी साँसे तेज़ थी, और गला सूख रहा था, पानी के खोने का डर मन को खा रहा था, लेकिन सब से ज्यादा हैरानी उसे अपनी प्रतिक्रिया पर थी – यह कैसा बवाल था, यह कैसा शोर था, क्यों उसका दिल ज़ोरों से धडक रहा था? उस नौजवन के प्रती यह कैसा आकर्षण था? एक क्षण ही तो उसे देखा था, फिर मन् मे यह कैसा भँवर? इससे पहले वह कुछ सोच पाती, घर के अंदर से आवाज़ आई:

“अरी ओ लाजवंती, आ गई तू?”

अपनी साँसों को रोकते हुए उसने वापस आवाज़ दी, “जी बापू” अपनी चुनर से उसने फटाफट पसीना पोंछा, और घाघरे की गाँठ को सीधा किया जो भागने से सरक गई थी| उसके बापू खोली के छोटे से दरवाज़े से झुकते हुए बाहर आए|

“कहाँ मर गई थी इतणी देर्?” उन्होने पूछा, मुँह सिकुडते हुए| “घड़े कहाँ है? पानी नहीं लाई? ”

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Tapish

April 20, 2006

(This story is running on my main blog, Random Expressions; let's say this is the repeat telecast here)

तपिश
लेखक: दीपक जस्वाल

रात चुप चाप दबे पाँव चली आ रही थी | शाम की मधुरिम लालीमा अपनी आखरी साँसे गिन रही थी | दूर क्षितिज पर अब भी कही उसकी लौ फड़फड़ा रही थी, मानो अन्धेरे से अपने जीवन की भीख माँग रही हो | पर अंधकार, जाड़ों की मोटी शाल ओढे, कोहरे मे खुद को लपेटे, कालिख का काजल लगाय अपनी मस्त चाल मे आगे ही आगे बढा जा रहा था | पंछियो के साथ साथ , लोग भी अपने घरौन्दो की ओर तेज़ी से लौट रहे थे | उन मे से एक मै भी था | दिन भर की थकन से चूर्, एक लंबे भीड वाली दिल्ली यातायात की बस के सफर के बाद्, मन मे यही इच्छा थी के जल्दी से घर पहुंचुँ | ऊपर से सर्द हवा की गति भी बढ रही थी |

बस कलोनी के भीतर दाखिल हुई, मेरा स्टाप आने वाला था, दरवाज़े की तरफ जाकर मै खड़ा हुआ और अपनी जैकट को ज़ोर से कसा | यहाँ पर काफी एकल था क्योंकि यह वाला स्टौप कलोनी के भीतर था | रास्ते की सरकारी बत्ती की हल्की रोशनी मे धुन्ध लहराती हुई साफ दिखई पड रही थी | हाथ सुन्न हो रहे थे | लेकिन मेरा दिल जानता था के सर्दी केवल बाहर नही थी | मन के भीतर भी सब कुछ् जमा हुआ था ; वहाँ भी एक गहरा अन्धकार रोशनी को हरा रहा था | उसका कारण मै जानता था, लेकिन पह्चानता नही था |

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Spring 2006

April 18, 2006



Spring 2006

Originally uploaded by Deejay2005.