Tapish

By Deepak Jeswal

भाग तीसरा

अपना नाम सुनकर लाजवंती असमंजस मे पड़ गई, और उसके कदम ठहर गए| कुछ भी सूझ नही रहा था | गर्मी में भी वह काँप रही थी| कानो मे शोर , ह्रदय मे बवंडर, दीमाग मे सुन्नपन, लाजवंती की हालत यूँ के काटो तो खून नही | कहीं अंदर से उसकी अन्तरात्मा ने उसे भाग जाने का निर्देश दिया , अब रुकी तो फिर कभी जा न पाएगी, पर हठीले पाँव चलने का नाम नही ले रहे थे |

छोटे ठाकुर करीब आए, लाजवंती की साँस थम गई| उसके कानो के पास, हल्की आवाज़ मे, प्रीति भरे स्वरों में, वह बोला, “प्यार होके रहेगा”

उसने तो फुसफुसाया था, पर लाजवंती को लगा जैसे सारे रेगिस्तान ने सुन लिया| एक एक शब्दांश था कोमल फूल-सा, पर मन मे गढ रहा था शूल सा| जब सहरा पे बारिश की पहली बूँद गिरती है तो कड़कड़ाती है, वैसी हालत लाजवंती की हुई| दोनो पीले मरूस्थल के बीच, गर्म हवा के आँचल मे ढके, यूँ तो कुछ क्षण ही खड़े थे, पर लाजवंती को लगा के एक युग बीत गया हो| रेत की तरह वह भी चारो दिशा फैल गई|

अपने बिखरे आपे को समेटते हुए, उसने जवाब दिया, “यह कभी न होगा” पर वह पहले वाली तपिश उसकी आवाज़ से लुप्त थी, और कहते ही घड़े संभालते हुए जितना हो सका उतना तेज़ी से भागने लगी|

उसके कदम तब तक धीरे न हुए जब तक घर के पास ना पहुँची|

“ऐ लाजो!” एक आवाज़ आई|

लाजवंती चौंकी, और कदम लुढ़के|

“अरे मै हूँ, के हुआ तुझे?” महुआ आँगन में खड़ी थी| लाजवंती की हालत को देखकर वह घबरा गई- चेहरा सुर्ख, पसीने से लत पत, आँखे लाल, साँसे तेज़|”थारी तबीयत तो ठीक है न?” महुआ ने लाजवंती के सर से घड़े लेने आगे बढ़ी| महुआ की मदद से लाजवंती ने घड़े ज़मीन पर उतारे और उसके गले लग कर रोने लगी|

महुआ का स्वर नर्म हुआ, लाजवंती के सर पर स्नेह भरा हाथ फेरते हुए कहा, “अरी के हुआ? कुछ बता न, देख म्हारो जिवड़ो घबरा रहयो है, उस राजू ने कोई छेड़ की के?”

लाजवंती ने ना मे सर हिलाया, “म्हारे साथ ही ऐसा कयों होता है, मैने ऐसा के गुनाह किया है महुआ?” लाजवंती सिस्कियों के बीच बुडबुडाई|

“यह के बोल रही है, बाँवरी हो गयी के? लगता है गर्मी लग गई तुझे, भरी दोपहर मे भाग के आई है न, चल अंदर थोडा आराम कर ले” यह कहकर्, महुआ लाजवंती को उसके घर के अंदर ले गई, एक लोटा पानी पिलाया और खाट पर लिटा दिया| लाजवंती बच्चों की तरह आज्ञा का पालन करती गई| वह महुआ को कुछ बता न पाई|

उसने ‘बीमारी’ का ही बहाना किया और कहा, “महुआ तू जा, मै थोडी देर आराम कर लूँ तो ठीक हो जाउँगी”

“ठीक है, पर देख तू आराम ही करना, खाना मै शाम को घर से ले आऊँगी”

लाजवंती ने हामी भरी; महुआ वहाँ से चली गई, और लाजवंती देर तक रोती रही|

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ठाकुर गजेंद्र प्रताप सिंह की महल-नुमी हवेली तीन माले ऊँची और हज़ारो गज़ ज़मीन मे फैली हुई रेगिस्तान मे एक सरसब्ज़ जगह की तरह थी | हवेली के आगे एक रमणीय कृत्रिम बाग़ खास विदेश के बाग़बानो द्वारा बनाया व संधृत था| ठोस पत्थर की विशाल इमारत् अति शोभायमान व रौबदार थी -मकराना से लाए गय विशेष संगमरमर के फर्श, बैल्जियाई श्रेष्ठ झूमर, दौसा व सिकंदरा के कारीगरों द्वारा की हुई महीन नक्काशीवाली खिड़कियाँ व देश -विदेश के चित्रकारों की रचनाएँ इस महल की शोभा मे चार चाँद लगाते|

सरकार ने राज-पाठ तो छीन लिया पर सिर्फ़ नाम के लिए; असल मे तो वह अब भी अपनी प्रजा के विधाता थे| उनकी तिजोरी मे क़ैद, बही खातो मे फ़ंसी, न जाने कितने अनपढ गरीबो की किस्मत छटपटा रही थी| कानून और पोलिस तो इस महल के रक्षक् ही थे, और फिर कौन बग़ावत करे, आडे वक्त तो ठाकुर साहब ही गरीबो के काम आते | किसी और सरकार को तो वो जानते ही नही थे, ठाकुरसां ही उनके मालिक, वही उनकी सरकार थे | ऐसा नही है के ठाकुर बहुत ही क्रूर दिल के थे, पर मालिक तो मालिक ही होता है, कितना भी संवेदनशील क्यों न हो|

अगर एक बात का गजेंद्र सिंह को बहुत नाज़ था तो वह था अपना सिहासी खून और शाही इतिहास | उनके हाव भाव मे भी एक राजकीए तेजस और चलन मे नृपोचित ठवन था| हर हफ्ते वह दरबार लगाते और जन्ता को न्याय, दान व ऋण देते; और उनके निर्णय ही उस गाँव का कानून बन जाते|

“रणवीर, कहाँ ग़ुम रहते हो आज कल?” अपने बेटे को सीढ़ीयों से उतरता देख गजेंद्र सिंह ने सवाल किया|

“कहीं नही पिताजी, बरसों बाद यहाँ आया हूँ तो हर चीज़ से वापस जान पहचान कर रहा हूँ”

“ऐसा तो कुछ भी नही बदला होगा यहाँ पे”

“शायद नही, पर तब मै बच्चा था, अब सब कुछ पक्की निगाह से देख रहा हूँ|” उसने हँसते हुए जवाब दिया|

“वह तो ठीक है, पर बेटा तुम्हारे ऊपर अब ज़िम्मेदारियाँ है, और मै यह चाहता हूँ यह के तुम काम काज के बोझ मे भी मेरा हाथ बँटाओ”

“लेकिन…”

“यह मेरा हुक्म है ” गजेन्द्र सिंह ने बीच मे टोकते हुए दृढ आवाज मे कहा|

रणवीर ने उन्हे छोटी निगाह से देखा, और मन मार कर बोला, “जी..”

“चलो शुरुआत आज के दरबार से ही करते है|”

यह कहकर, गजेंद्र सिंह बाहर बड़े दरबार के कमरे की ओर चले गए| वहाँ सब तैयारी थी, उनकी ऊँची गद्दी, बही के ढेर और मुनिमजी सब मौजूद थे| लोगो की कतार आ चुकी थी, और जैसे ही मुनिमजी ने घोशणा की, एक एक करके सब अंदर आने लगे| रणवीर सारे परिदृश्यको आधे मन से देखता गया|

उस दिन हीरा भी था वहाँ पे; ऋण को चुकाने की आखरी तिथि आ चुकी थी; उसकी खोली यहीं गिरवी थी |

“सरकार कुछ दिन की मौहलत और मिल जाती तो…” झूठी विनम्रता से हीरा ने कहा|

“वह तो हीरा तू पिछली बार भी कह के गयो थो,” मुनिमजी ने कहा,”अब तो असल और सूद मिलाकर दस हज़ार हो गया है”

“माईबाप्, सब चुका दूँगा, पर क्या करूँ…”

“बस, इस महीने के आखिर तक सारा कर्ज़् चुका देना, नही तो घर जब्त,” गजेन्द्र सिंह ने फैसला सुनाया; मुनिमजी ने फटाफट लिखा |”अगला…”

हीरा का चेहरा उतर गया| भारी कदमो से चलकर वह बाहर आया, गम्छे से उसने पसीना पोंछा, और घृणा से हवेली को देखने लगा| अब द्स हज़ार कहाँ से आएँगे| काश्, उस्का भी एक बेटा होता, लेकिन नही, निगोडी किस्मत ने दी तो वह नालायक बेटी जो अपनी माँ को भी खा गई|

यही सोचते हुए वह गाँव की ओर बढ़ा पर घर न जाकर बाज़ार की ओर रुख किया| धनी राम चाय की दुकान – वहीं बाजार मे, पीपल के पेड़ के आगे व किराने की दुकान से पहले, एक मशहूर अड्डा था वक्त बिताने का; अब तो उसने टेलिविज़न भी लगा लिया था तो अक्सर लोग अपना काम खत्म करके वहीं जाते; बुधवार व शुक्रवार की शाम तो मेला सा लग जाता जब सब खाने के बाद वहाँ “चित्रहार” देखने आते|

“जा छोटू, एक कड़क चा ले आ, दूध कम,” हीरा ने वहाँ पर काम कर रहे लड़के से कहा, और माथे पे हाथ धरे, बाहर पड़े बेंच पर बैठ गया |

दुकान के भीतर से आवाज़ आई, “राम राम हीरा|”

“राम राम धनी राम”

धनी राम ने व्यंग्य करते वापस आवाज़ लगाई, ” के बात है सूरज ढलने को आयो और तू अभी तक चा ही पी रहयो है?”

“क्यों? मै के कोई प्रमाणित सराबी हूँ जो चा नही पी सकता?” खीजते हुए हीरा ने जवाब दिया|

पास ही से एक बैन्च सरकने की आवाज़ आई | “अरे नाराज़ क्यों हो रहे हो हीरा, वह तो बस थोड़ा मजाक कर रहयो है |” महुआ के पिता घन्श्याम ने वहाँ बैठते हुए कहा, और दुकान के भीतर मुँह करके आवाज़ दी, “राम राम धनी सेठ|”

हीरा ने उसे देख कर मुँह बनाया, और दूसरी ओर देखने लगा|

अन्दर से धनी राम दबी हुई हँसी के साथ बोला, “राम राम जी, क्यों मज़ाक उड़ा रहे हो सेठ कहकर, के दूँ चा या ठंडा”

“चा ही चलेगी इस पहर,” घनश्याम ने उत्तर दिया| हीरा की तरफ देखकर बोला, “क्यों हीरा? बहुत परेसाण लागे हो?”

वैसे तो हीरा और घनश्याम के बीच कोई खासी यारी नही थी, यहाँ तक के हीरा तो कई बार उसे देखके के रास्ता भी काट जाता था, पर जब मन मे बोझ हो तो जो कोई हमदर्दी का पहला मल्हम लगाता है उसे अपनी बात कहने को जी कर ही आता | बहुत ही दुःखी स्वर मे हीरा बोला, ” के बताऊँ? ठाकुरसां ने एक माह की मौहलत दी है कर्ज़ चुकाने की| |”

“ह्म्म्म्, मामला तो गम्भीर ही है”

हाल्फ्-पैंट और गाँजी पहने हुए एक बालक ने आकर सामने चाए से भरे हुए दो काँच के छोटे ग्लास रखे| हीरा ने उठा कर एक गरम घूँट लिया और बोला, “हाँ,समझ नही आ रहा के करूँ|”

“देखो भाई मै पहले भी कह चुका हूँ, तू एक तो सराब मा पैसा उड़ाणा बंद कर| पैसे तो बचाणे से इकठ्ठे होणे है, न के सराब मा उड़ाणे से|” घनश्याम ने संजीदा अंदाज़ मे कहा|

पर यह बात हीरा को चुभते नश्तर सी लगी,”तुम तो पैसो की नसीहत मत ही दो| दो दो जवान बेटे है, बड़े शहर से हर महीने मनी आर्डर आता है|मेरे पल्ले तो किस्मत ने एक बोझा बाँध दिया है|”

घनश्याम ने गहरी साँस छोड़ी, “दूर के ढोल तो सुहावने ही लागे है हर किसी को, अगर म्हारे दो दो बेटे है तो दो बेटिया भी तो है म्हारी, हिसाब बराबर” फिर थोड़ा आगे झुकते हुए वह बोला, “एक और पते की बात बताता हूँ” अपनी हथेली पर दूसरी हाथ की उँगली रखी और कहा, “आदमी की किस्मत यहाँ नही, पर यहाँ होती है”, अपनी उंगली को उठा कर उसने हीरा के बाजू पे रख दी|

हीरा को यह बात अच्छी नही लगी| उसके मन मे तो अब भी यही विचार था के लाजवंती की जगह अगर नसीब ने एक अदद बेटा दिया होता तो आज उसकी यह नौबत न होती|

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” थारी तबीयत कैसी है अब?” महुआ ने पूछा|

“अब ठीक हूँ|”

दोनो सहेलियाँ पानी भरने जा रहीं थी| लाजवंती की अकेले जाने की हिम्म्त नही हुई के कही फिर रणवीर न रास्ता रोक ले | जैसे जैसे वह उस जगह के पास पहुँची वैसे वैसे उसका धैर्य ढीला हुआ| उसकी निगाहे सारे फैले मरूभूमी को ग़ौर से देख रहीं थी |

“तू के इधर उधर देख रही है?” महुआ ने पूछा, और अंजाने मे बोल पड़ी, “कही कोई बालम तो नही मिल गया?”

अब लाजवंती से बर्दाश्त नही हुआ, किसी को तो बताना ही था मन का भय्, और महुआ से करीबी सहेली तो कोई और थी भी नही| “यही समझ ले”

महुआ के पैर जम गए| उत्तेजित होकर, बच्चो की तरह उछल कर बोली, ” कोण? और यह बात तू अब बता रही है| तो थारे को गर्मी नही, इसक को रोग लगा है|”

एक छोटी पर हल्की नाराज़गी सी थपकी लाजवंती ने महुआ के काँधे पे मारी, “चल, हंसी न बना, ऐसी कोई बात नही है| उसने दो बार रास्त्ता रोका है, प्यार भी जताया, और तो और मेरा नाम भी जानता है | म्हारी तो जान ही सूख रही है |”

“हाय हाय मै मर जाऊँ” ठंडी आह और हँसी को मिलाके महुआ बोली, “कोई दिलदार आसिक मालूम पड़े है| नाम तो बता, अपने गाँव का तो न लागे है, यहाँ ऐसे मर्द ही कहाँ|”

“उफ्फ्, तू भी कुछ भी बोले जा रही है| यहाँ मेरी जान को आफत लगी है|”

“अरे इसमे आफत कैसी|फट से हाँ बोलदे, थारो बापू तो वैसे भी थारे लिए कुछ करने वाला नही, जो सच्चा मरद दिखे उसी की हो जा”

“तू चुप भी करेगी के नही, ऐसे ही बोलती रही तो मै तुझे कुछ भी नही बताने वाली” नकली गुस्से से भौहे चढ़ा कर लाजवंती ने कहा|

“ले” अपने होंठ पर अँगुली रख कर महुआ बोली, “हो गई मै चुप| तू अपना पूरा भाव खा”

“नाराज़ मत हो, बता रही हूँ वह कौन है… छोटे ठाकुरसां|”

महुआ के पैरो तले ज़मीन खिसक गई, चेहरे से रंग काफूर हो गया, मुँह लटक गया , “हाय राम”

“हाँ म्हारी भी यही हालत थी”

“देख तू मज़ाक तो नही कर रही न?”

“नही नही, तेरी कसम, सच बोल रही हूँ| म्हारो जियरो घबरा रहयो है | यहीं मिला है दो बार” और लाजवंती ने उसे दोनो दिन की दास्तान सुनाई| काफी देर तक दोनो सहेलिया वही खड़ी विचार करती रहीं के आगे क्या करना है| दोनो की समझ सीमित थी, और बात गोल गोल ही घूमती गई|

उस दिन रणवीर नही आया, न अगले दिन्, न उसके तीसरे| तब तक लाजवंती का हौसला लौट्ने लगा| हो सकता है के यह रणवीर का क्षण भर का खिंचाव था जो बीत गया | उसकी जान मे जान आने लगी | रात को सितारो के नीचे बैठी वह अब यही दुआ माँगती के कुछ न बदले, जैसे चल रहा था वैसे ही चलने दे; वह भी मूर्ख थी जो अंजाने मे क्या माँग बैठी|

लेकिन सितारो ने जो खेल शुरू किया था वह तो पूरा होकर रहना था|

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गाँव के बाहर, राजमार्ग से थोड़ा परे एक टीला है जहाँ लाजवंती अक्सर आया करती थी| शाम को वहाँ बैठकर डूबते सूरज को देखना उसे भाता था| वहाँ उसे लगता के जैसे वह अपनी छोटी सी दुनिया का नियंत्रण कर रही है| सामने था राजमार्ग्, जो किसी कच्ची सड़क से थोड़ा ही बेहतर था |उससे से एक रास्ता भीतर गाँव को जाता, तो दूजा हवेली के तरफ, सीधा जाने से कुछ ग़ाँव बाद ज़िला अधिकारी का शहर था; यहाँ से देखो तो हवेली छोटी ही दिखती|

गाँव और हवेली के बीच के रास्ते मे एक मँदिर था, जो खास गाँव वालो के लिए बनाया गया था; यहाँ पर हर कोई पूजा कर सकता| पुरोहितजी कहते के “अगर कोई अछूत होता तो भगवान ने उसे छू कर बनाया कैसे?” यहाँ हर साल एक विशाल जलसा जन्माष्ठमी पर आयोजित होता| ज़्यादा आलिशान तो नही, पर फिर भी इस गाँव के हिसाब से बेहद ही खूबसूरत था| ठाकुरों के लिए तो अलग मंदिर उन्ही के घर के कुछ दूरी पर था|

अगर नज़र दाँय ओर करो तो कुछ किलोमिटर की दूरी पर एक खंडहर था – रेत की ही तरह पीला, और धूल से लतपत| कोई उसके इतिहास को नही जानता था, लोग कहते है के ठाकुरों के परिवार का ही होगा, पर किसी ने कभी पुष्टी नही की| सरकारी कागज़ों मे भी वह ग़ुम था| रेगिस्तान की मिट्टी मे वह अंजान ढाँचा न जाने क्या किस्से अपनी छाती मे बँद किए बैठा था|

लाजवंती वही बैठी रहती| क़िले के पीछे ही सूरज ढलता, और वह उसकी बुझती लाली और तेज को निहारती| एक अद्भुत द्र्ष्य होता रोज़-जैसे किसी महान चित्रकार ने अपना सारा हुनर आसमान पे बिखेर दिया हो|

“ढोला रे, तू आजा,” कहीं दूर से कोई गीत गा रहा था|

लाजवंती गहरी साँस लेकर टीले की रेत पर सर रख कर आसमान को देखने लगी| वह भी कितनी नासमझ थी – कौन ढोला उसके लिए आएगा; सिनेमा की बनावटी बातों को यथार्थ समझ बैठी| पर सपनो पर किसी का अधिकार नही होता; पृक्रति की तरह सपने भी भेद भाव नही करते| उस शांत से वातावरण मे, जहाँ केवल हल्के पवन का संगीत और गीत की दूर से आती आवाज़ थी, कब लाजवंती ने आँखे बंद कर ली उसे खुद पता नही चला |

जब आँखे खुली तो एक साया अपने उपर पाया| चौंक कर वह उठी, और अपनी धानी चुनर सँभाली|

“कितनी सुहावनी लग रहीं थी, जैसे कोई परी स्वर्ग से उतर कर धरती पर अपनी लौ बिखेरने आई हो |”

“ठाकुरसां, आप?” रणवीर को वहाँ पाकर वह काँप गई | क्या यह सच था? अभी अभी उसने उसी का तो सपना देखा था| रणवीर ऊँठ पर सवार था|

“ठाकुर तो पिताजी है मेरे| तुम्हारे लिए तो मैं सिर्फ रणवीर हूँ|”

अपनी गर्दन को उपर कर के, अनिश्चित नज़र से लाजवंती ने रणवीर को देखा| सफेद कमीज़ और रेती रँग के पतलून मे वह और भी आकर्षक दिखाई दिया|

“ठाकुरसां आप बहुत ऊपर है, मै बहुत नीची, आप जाने ही दो”

अपने ऊँठ को बैठाते हुए, रणवीर ने कहा, “लो यह दूरी इसी पल कम किए देते है”

व्यँग्य भरी ,अपेक्षा से चूर्, एक आधी मुस्कान के साथ लाजवंती बोली, “यह दूरी सदियाँ न मिटा पाई, तो एक पल मे क्या दूर होंगी?”

एक झट्के से रणवीर आगे झुका और लाजवंती को कमर से पकड़ कर अपनी ओर खींचा| लाजवंती के बदन मे बिजली सी दौड़ गई, लब से एक आह निकली|

कसमसाते हुए लाजवंती ने कहा, “छोड़ीए| मुझे छूना भी आप के लिए पाप है”

“प्यार मे पाप क्या पुण्य क्या” रणवीर ने कहा| उसकी नर्म साँस लाजवंती के कोमल गर्म चेहरे से टकराई, और एक तूफान पैदा हुआ, जिसके तेज़ से लाजवंती के जिस्मोजान मे सिरहन की लहरे बहने लगी; दिल की धड़कन शोर कर रही थी|

“मुझे प्यार नहीं आपसे” लाजवंती ने कहा, खुद को छुड़ाते हुए, पर रणवीर की पकड़ ज़ोरदार थी|

एक शरारत भरी मुस्कान उसके के होठों पे झूलते हुए, रणवीर ने कहा, “सच? पर मै नही मानता| क्या तुम खुद मानती हो?”

लाजवंती का साहस टूट गया, उसकी निगाह रणवीर की आँखो मे अटक गई; वह रणवीर की निगाहों की कशिश से बच नही पाई|

प्रेम का सावन तो आँखो के बादल से ही बहता है- न जाने कितने युगो से प्रेमियों की आँखो ने कब इकरार कर दिया जो ज़ुबान की झिझक नही कर पाई; फिर आज वहाँ पे दो प्यार करने वाले मरूभूमी मे प्यार का कँवल खिलाया, और निगाहो ने उस पर इज़हार का अमृत छिड़का|

“ढोला रे, ढोला” गीत अपने चरम सीमा पे पहुँचा; हवा की साँय साँय बढ़ी; शरमाते हुए सूरज ने विदा ली…और लाजवंती कसी हुई रणवीर की बाँहो मे, आँखों से कुछ कहती, कुछ सुनती, स्वंयम से बेखबर खड़ी रही|

क्रमश:

3 Responses to “Tapish”

  1. आशीष Says:

    भईये समां तो अच्छा बांधा है, कहानी की अगली किश्त का ईंतजार है !

    आशीष

  2. Deepak Jeswal Says:

    आशिष भाई, यह तो सिर्फ एक ‘टेस्ट ब्लौग’ था | इस कहानी को पूरा आप यहाँ पढ़ सकते हो :

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  3. alieksjii Says:

    Here are some links that I believe will be interested

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