Tapish

By Deepak Jeswal

(This story is running on my main blog, Random Expressions; let's say this is the repeat telecast here)

तपिश
लेखक: दीपक जस्वाल

रात चुप चाप दबे पाँव चली आ रही थी | शाम की मधुरिम लालीमा अपनी आखरी साँसे गिन रही थी | दूर क्षितिज पर अब भी कही उसकी लौ फड़फड़ा रही थी, मानो अन्धेरे से अपने जीवन की भीख माँग रही हो | पर अंधकार, जाड़ों की मोटी शाल ओढे, कोहरे मे खुद को लपेटे, कालिख का काजल लगाय अपनी मस्त चाल मे आगे ही आगे बढा जा रहा था | पंछियो के साथ साथ , लोग भी अपने घरौन्दो की ओर तेज़ी से लौट रहे थे | उन मे से एक मै भी था | दिन भर की थकन से चूर्, एक लंबे भीड वाली दिल्ली यातायात की बस के सफर के बाद्, मन मे यही इच्छा थी के जल्दी से घर पहुंचुँ | ऊपर से सर्द हवा की गति भी बढ रही थी |

बस कलोनी के भीतर दाखिल हुई, मेरा स्टाप आने वाला था, दरवाज़े की तरफ जाकर मै खड़ा हुआ और अपनी जैकट को ज़ोर से कसा | यहाँ पर काफी एकल था क्योंकि यह वाला स्टौप कलोनी के भीतर था | रास्ते की सरकारी बत्ती की हल्की रोशनी मे धुन्ध लहराती हुई साफ दिखई पड रही थी | हाथ सुन्न हो रहे थे | लेकिन मेरा दिल जानता था के सर्दी केवल बाहर नही थी | मन के भीतर भी सब कुछ् जमा हुआ था ; वहाँ भी एक गहरा अन्धकार रोशनी को हरा रहा था | उसका कारण मै जानता था, लेकिन पह्चानता नही था |

सुनयना मेरे ही दफ्तर मे काम करती थी , पिछले कई महिनो से हम धनिष्ट मित्र बन गय थे, लेकिन इस रिश्ते का इस से आगे भी कोई वजूद होगा, यह मैने सोचा भी न था | मेरी उम्र ही क्या थी? केवल बाईस साल – मै ताज़ा ताज़ा अपने पैरों पर खडा हुआ था, एक तो नई नौकरी का जोश , उस पर अपनी कमाई को खर्च करने की आज़ादी, फिर वह उमर का लडकपन; कुल मिलाकर, जीवन एक मौज मस्ती का सफर प्रतीत होता था, न के एक ज़िमेद्दारियों से लदा हुआ ठहराव | न मुझमे किसी के जज़्बात को समझने की अकल थी , न ही किसी के अरमानो को पढने की तमीज़; मै सोचता था के मेरे उमर मे सभी ऐसे ही होते होंगे, यह उमर होती ही रंगीली है …पर मै भूल गया था के सुनयना भी तो मेरी ही हमउम्र थी | उस मे मुझ से कही अधिक संवेदन्शीलता , कही ज़्यादा धैर्य , और कई गुना दीमाग था | उसकी खुशियाँ केवल यही तक नही सीमित थी के नया क्रेडिट कार्ड आया है तो दोस्तों मे शान मारने के लिए उनके के साथ जाकर दो बियर पी लो |

कल जब उसने हमारे रिश्ते की बात छेडी तो मै दँग रह गया |

"मै तुमसे कल ही शादी करने की बात नही कर रही, धीरज, पर एक कमिट्मेँट तो हो" उसने कहा था, " मै एक लडकी हूँ, आज भी हमारे समाज मे लोग बाते बनाते है; पूरा दफ्तर हमारे चर्चे करता है; इससे मेरी इज़्ज़त को ठेस पहुँचती है| पर जहाँ सारा जग इस बारे मे बात कर रहा है, वहाँ तुम एक दम ही खामोश् हो"

लेकिन मै फिर भी खामोश ही रहा – क्या कहता? इस बारे मे मैने कुछ सोचा ही नही था, और सच बताऊँ उस वक्त मुझे सुनयना का व्यव्हार गले पडने जैसा लगा| कल तो कुछ नही बोला, लेकिन आज मैने उसे साफ साफ बता दिया के मुझे यह सब सोचने का अभी कतई भी मन नही है| शायद वह मेरा जवाब जानती थी , इस लिए कुछ नही बोली | मुझे उस की चुप्पी खल रही थी | यह उसकी प्रतिक्रिया होगी ऐसा मैने नही सोचा था ; मुझे लगा था के वह रोयगी, चिल्लायगी, गिड्गिडाएगी , मुझसे मुहब्बत की भीख माँगेगी, मुझे वफा की दुहाई देगी | उसकी खामोशी मेरे मर्दाना अहम् को क्षति पहुँचा रही थे |

पर मन मे एक और कौतुहूल था – मुझसे उसकी आँखों के लाल डोरे बर्दाश्त नही हो रहे थे | रह रह कर मेरी नज़र उसके कोमल चेहरे को तलाश करती रही | बार बार् मै उसके केबिन के सामने से गुज़रता रहा, के किसी बहाने से वह मुझे पुकारे | लेकिन मेरी कमज़र्फ निगाहों को मिली तो केवल उसकी धिक्कारती हुई आँखे | लँच मे मै जान बूझकर उसी के आस पास मँड्राता रहा के शायद वह मुझसे बात करे, परंतु मेरे अँहकारी कानो को मिला तो बस उसके दर्द से चीखता हुआ सन्नाटा | किसी कामवर्श जब भी वह मेरे डेस्क के करीब से जाती तो मन झूम उठता, पर मेरे खुदगर्ज़ दामन मे गिरी तो सिर्फ उसकी नफरत मे लिपटी हुई आह्ट |

यह मुझे क्या हो चला था – क्या यही प्यार है?

यही सोचता हुआ मै उस दिन शाम को बस से उतरा| जैसे ही मेरा पैर बस स्टौप के ऊँचे तले पर पडा तो वह किसी चीज़ से टकराया | वह वस्तु एक कर्कश खनक के साथ लडखडाती हुई सडक पर गिरी; और गहरी गाढी चाय मे नहाते हुए, अनगिनत टुकडो मे टूट कर बिखर गई, | वह स्टौप के कोने पे ही रखी हुई थी – एक मिट्टी से बनी हुई प्याली , शायद पास के ही चाय्-वाले की होगी|

"तोड दिया" एक आवाज़ कराही|

मै चौंका |

वह एक अधेड उम्र की औरत थी, उसका चेहरा झुर्रियों से भरा था, आँखें दबी थी, और मुँह मे दाँत नही थे| वह वहीं परछाईं मे बैठी थी इसी लिय मै पहले उसे देख नही पाया|

"मुझे माफ करदो अम्मा" मै हकलाया| उसकी आँखे, जो कागज़ी, पीले, हल्के माँस मे धँसी हुई थी, एकटुक मुझे आरोपी नज़र से घूरे जा रही थी, और मुझे उनसे डर लग रहा था|

अपना दुर्बल सर हिलाते हुए वह बोली, "वह तो चला गया," उसकी भाषा मे ह्ल्का राजस्थानी निशान था| "टूट गया, खत्म हो गया" वह बुरबुराई|

मै असमंजस मे पड गया| कुछ ना सूझते हुए मैने कहा, "माई, मुझसे भूल हो गई, मै इसका हरजाना भर देता हूँ|"

एक आह भरते हुए, उसने अपनी भूरे रंग की साडी के प्ल्लु को, जो उसके माथे से सरक रहा था, ठीक किया| ऐसा करने से, उसके हाथो मे मोटे मोटे काँस्य के कंगन खनकें| उसकी साडी मैली और कंगन पूराने थे| पाँव गन्दे थे तथा उनके छोटी उन्गलियओं मे परंपरागत बिछ्छउए थे| वह दीवार से सट कर बैठी हुई थी|

"लेकिन प्याला तो टूट गया ना" उसने उदास आवाज़ मे कहा; शायद मेरी बात उसने सुनी ही नही थी|

यह सुनकर्, मुझे गुस्सा आया, मै पैसे देने के लिए तय्यार तो था, फिर किस बात की शिकायत, किस कारण इतना नाटक? मै ऊँची आवाज़ मे अपना क्रोध ज़ाहिर ही करने वाला था के मेरी निगाह उसकी आँखो पर पडी| एक कतरा आँसू का वहाँ से टपक कर उसके गालों पर ठहर गया|

"आप तो हरजाना भर देशो, लेकिन इस प्याली का के?" वह बिना थमे, अपनी ही सोच मे बोलती रही, "यह तो चकना-चूर हो गयी, बर्बाद हो गयी"

"वह एक मिट्टी की बेमोल प्याली ही तो थी"

"ह्म्म्म्," उसने कहा, "बेमोल मिट्टी…जैसे यह शरीर, जैसे यह अत्मा | अनमोल या बेमोल सब बराबर ही है ना|"

यह सुनकर मै नरमा गया – एक अजीब सा दर्द था उसकी आवाज़ मे, एक अजीब सा ग़म था उसके स्वर मे – मानो के जैसे वह उसके गले से नही बल्की नैरश्य व विनाश के किसी गहरी खाई से उभर कर के आ रहीं हो – एक वाणी जिसे अन्गिनतों बार तड्पाया गया हो, सैंकडों बार लूंटा गया हो, हज़ारों बार झुल्साया गया हो; जिस्मे से सारी कोमलता क्रूरता से छिली गई हो|

शायद मेरे अंदर का तूफान था जो किसी और की आँधी मे घुल कर ध्वस्त होना चाह्ता था, या उस औरत के आवाज़ की कशिश थी, मै नही जानता, पर मै बर्बस ही बोल पडा, "माई, क्या हुआ, क्या दुःख तुम्हे खाय जा रहा है?" और् टँगडी मार कर ठंडी ज़मीन पर बैठ गया| "कहते है दुःख बाँटने से कम होता है, मै तो आपसे अंजान हूँ, खुल के कह सकतीं हो, क्या गम है जो तुम्हे यूँ सता रहा है?"

कुछ पल वह चुप रही| उसकी आँखे नम थी , और अब वह दूर नज़र टिकाय बैठी थी| मुझे लगा जैसे उसने मुझे अभी तक ठीक से सुना नही, मैने अपनी इल्तजा फिर दोहराई| लेकिन कोई जवाब ना आया| मै उठने ही वाला था के वह बोल उठीं, "मेरा गम, मेरा जीवन"

और वह अपनी ज़िंदगी की कहानी सुनाने लगी| | उस सर्दी की रात्, धीमी सी रोशनी तले, मैने उसकी दास्तान सुनी – एक इंसानी त्रास की ऐसी दास्तान्, जो उतनी ही अंधकारमयी , उतनी ही शीत थी जितनी के वो रात |

भाग पहला

जैसलमेर के रेगिस्तान मे बावोडी गाँव के एक गरीब हरिजन परिवार मे लाजवंती ने जन्म लिया| वह इलाका राजपुतों का था | धरती, सूरज चान्द सितारो ने तो अपने गुण बाँटने मे कोई भेद नही किया; पर बावोडी और उसके आस पास के सभी गाँव मे सभी कुछ दो हिस्सो मे बंट चुका था, यहाँ तक के पानी भी| रेगिस्तान के तप्ते मौसम मे पानी अमृत से कम नही होता, पर सभी हरिजनो के लिय यह अमृत पाँच किलोमिटर के कठिन सफर के बाद ही नसीब होता था; वह भी रोज़ नही , क्योंकि हरिजनो के लिए जो कुँआ नियुक्त हुआ, उसमे पानी तो हमेशा ही कम रह्ता, तो जो भी पहले जाकर अपने लिय पानी ले आता , वह संतुष्ट रहता; देर से आने वाले अपना हाथ विवश्ता मे मलते रह जाते है| विधी की सबसे बडी विडम्बना तो यह थी के 'बावोडी' गाँव का नाम , उस क्षेत्र की सबसे विशाल बाव्ली के होने के कारण से रखा गया, जिसे पुराने ज़माने के राजाओ ने बनवाई थी | लोग कह्ते है, के कभी यह भी वक्त था के अगर पूरे राजस्थाण मे पानी न मिले तो भी बावोडी मे ज़रूर मिल जाता था | मगर , अब यह आलम था के उन्ही राजाओं के उत्तराधिकारीयों ने उस बाव्ली को अपने कब्ज़े मे कर लिया, और गरीब जन्ता को दूर दूर से पानी लाना पड्ता था| राजा और राज तो खत्म हो गए पर उनके पूत रह गए शोशण करने के लिए|

ऐसी ही गर्म और जलती रेत पर चलके, लाजवंती रोज़ सुबह शाम पानी भरने जाया करती थी, सर पर दो भारी घडे सम्भाल कर्| कह्ते है, पूरे गाँव मे लाजवंती सबसे सुन्दर थी – गहरी दो काली काली आँखें, लम्बे घने बाल्, सुराहिदार गर्दन, साफ चमकीली त्वचा, मनभावन चेहरा और हिरण सी नशीली चाल| शोखी उसके रग रग मे भरी थी| लज्जा व बातो की मिठास उसके गहने थे|

उस दिन मे कुछ भी तो नया सा नही लगा, पर सितारे किसी के ज़िन्दगी मे क्या दिखलाने वाले है यह तो कोई नही जानता| किसीभी ज्येठ के महीने के दिन की तरह वह भी एक तपन भरा दिन था – चारो ओर पीला रेगीस्तान फैला हुआ था, और उसके बीच जलती सड़क पर वह अकेली तेज़ कदमो से चल रही थी, घर पहुन्च कर खाना भी बनाना था| उसकी सहेली महुआ नही आई उस दिन; और बाकी गाँव की औरते, जो साथ गईं थी, अभी भी पीछे कुएँ पर गप्पे मार रहीं थी; लाजवंती नही ठहरी थी; उसके बापू ने मना जो किया था वहाँ पर फिज़ूल रुकने के लिए|

गर्म हवा की लपटे लाजवंती के पल्लु को फुला रही थी, जिसे काबू मे रखने के लिए, उसने दाँतो मे दबोच लिया| सर पर वही दो भरे हुए पानी के घड़े थे, जिन्हे एक हाथ से लाजवंती ने पकड रखा था | वहाँ अपने खयालो में गुम थी इसलिए पीछे से उस को आते नही देखा|

यकाएक वह सामने आकर खडा हुआ, और बोला , "राम राम"

घबराहट मे, लाजवंती के हाथ से घडे गिर गए जो ज़मीन से ट्कराकर चूर चूर हो गए| लाजवंती ने पानी के ठंडे स्पृश को पाँव पर मह्सूस किया| उसने जल्दी से अपना चेहरा घूंघट से ढक लिया| लाजवंती शरमाई हुई, अपने आप मे सिम्टी हुई बुत बनी खडी रही; अपने ही घूंघट मे वह समाई जा रही थी| पल्लु की चिरे से उसने देखा के सामने एक सुरूप नौजवान था – ऊन्चा कद्, चौडी छाती, गोरा रंग | चेहरा मे तेज, यौवन चमकता, आँखे भूरी और बाल छोटे व घुँघराले थे|

"माफ किजीयेगा, मेरा मकसद आपको डराने का नही था," बहुत ही सहज भाव से उसने कहा|उसकी आवाज़ बहुत ही मधुर थी|

डर और गुस्से से काँपते हुए, लाजवंती की आँखे उसे घूरती रही|

लाजवंती की खामोश नाराज़गी समझकर वह जल्दी से बोला,, "गुस्ताखी के लिय क्षमा, पर आपके रूप के आगे खुद को रोक ना पाया "

लाजवंती वहाँ से भागी, पहले धीरे, फिर तेज़ – रेत के टीलो के ऊपर-नीचे, खुले नीले आस्मान के तले, पाँव धूल उडाते हुए, पायल शोर मचाते हुए, पल्लु सर से सरक गया,माथे का टीका सटक गया, बदन मे तपिश दौडती हुइ, सीने की धडकन रौंधती हुई, हाथो की चूडियाँ गाती, नथनी उसे दौहराती – लेकिन लाजवंती को कोई खबर न सुध, वह बस भागती रही |

अगर वह एक बार भी पीछे मुड कर देखती तो पाती के वह नौजवान उसे दूर जाते हुए एकटुक खडा तकता रहा जब तक वह क्षितिज मे समा नही गई और आँखों से ओझल नही हो गई|

क्रमशः

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