Tapish

By Deepak Jeswal

भाग दूसरा

लाजवंती तब तक भागती रही जब तक वह अपने घर की दहलीज़ तक नही पहुँची| उसकी साँसे तेज़ थी, और गला सूख रहा था, पानी के खोने का डर मन को खा रहा था, लेकिन सब से ज्यादा हैरानी उसे अपनी प्रतिक्रिया पर थी – यह कैसा बवाल था, यह कैसा शोर था, क्यों उसका दिल ज़ोरों से धडक रहा था? उस नौजवन के प्रती यह कैसा आकर्षण था? एक क्षण ही तो उसे देखा था, फिर मन् मे यह कैसा भँवर? इससे पहले वह कुछ सोच पाती, घर के अंदर से आवाज़ आई:

“अरी ओ लाजवंती, आ गई तू?”

अपनी साँसों को रोकते हुए उसने वापस आवाज़ दी, “जी बापू” अपनी चुनर से उसने फटाफट पसीना पोंछा, और घाघरे की गाँठ को सीधा किया जो भागने से सरक गई थी| उसके बापू खोली के छोटे से दरवाज़े से झुकते हुए बाहर आए|

“कहाँ मर गई थी इतणी देर्?” उन्होने पूछा, मुँह सिकुडते हुए| “घड़े कहाँ है? पानी नहीं लाई? ”

घबराहट मे , लाजवंती ने दाँतो तले निचला होंठ दबोचा | “बापू, वह …” लेकिन वह सच क्या बताती? तेज़ी से उसने अपना दीमाग चलाया, और झूठ बोला, ” म्हारो पैर मुड़ गयो, घड़े टूट गए, पानी बह गया|”

“के बोली?” उसके बापु ने घृणा से लिप्त आवाज़ मे कहा, “तू भी क्यों नही टूट आई वहाँ पर? पता नही
कौण से जन्म को बदला ले रही है? नुक्सान कर आई? और अब खाना कैसे बनावेगी?”

लाजवंती पत्ते की तरह डर से काँप रही थी, वह नीची निगाह करके, हाथो को आपस मे दबाते हुए, साँस रोके हुए खडी रही | उसके पिता उसे नफरत से देख रहे थे| छः फूट का कद होने से वह लाजवंती से कहीं अधिक लंबे थे – गंठा हुआ सख्त शरीर्, चेहरा पक्का हुआ चमड़े सा और सफेद होते हुए बाल के कारण वह अपने चालीस साल की उमर से ज़्यादा वृद्ध व्यतीत होते थे|

“मै महुआ के घर से थोडा पानी ले आती हूँ,” धीमे, सहमे स्वर मे लाजवंती ने कहा|

“हाँ, तो कब लावेगी, अपने बाप के किर्या करम पे?” उस्के पिता ने कटुता से कहा|

“बापू, ऐसा क्यों बोलते हो” लाजवंती की आँखे भर आई थी|

“और केसो बोलूँ जब से पैदा हुई है, मार तो दिया है तूने कँबख्त् – मै बाज़ार जा रहा हूँ और फिर राम सरण के घर, आने मे देर होगी” – यह कह्ते हुए वह आँगन के बाहर चले गए| लाजवंती तब तक साँस रोके खड़ी रही जब तक वह गली के आखिर तक नही पहुँचे|

यह तो रोज़ का सिलसिला था| हीरा को जितनी भगवान से नफरत थी , शायद उससे कई गुणा ज़्यादा अपनी बेटी से थी| गरीबी और् ज़िन्दगी की झूझन से वह भी रेगिस्तान की रेत सा रूखा, सूखा और किसकिसा बहुत ही पहले बन गया था; उस पर बेटी का जन्म किस्मत का एक ऐसा प्रहार था जिसे वह सहन नही कर पाया| शराब की लत उसे द्वेष के दलदल मे और दबोचती गई| पर सबसे अधिक बैर उसे लाजवंती से इस लिए थी क्योंकी वह उस अपनी पत्नी की मौत का कारण समझता था|

उस वक्त लाजवंती चार साल की थी; बचपने मे वह ज़िद्द कर बैठी के उसे वही दुल्हन वाली गुडिया चाहिए जो उसके सहेली के पास थी | बहुत शोर मचाया, घर सर पे चढा लिया| उसकी माँ से उसकी हालत देखी न गई और शहर के बाज़ार को चल दी| यूँ तो बरसात सहरे को तिरसकृत करती है, पर जब बरसती है तो कहर ढाती है| उस रोज़ भी ज़ोर की बारीश हुई – बारीश नही, वह तो यमराज का अवतार था, जो पानी बनकर लाजंवती की माँ को लेने आया था| बाज़ार से लौट्ने के बाद्, माँ ने बिस्तर पकड लिया, और फिर कभी नही उठी|

उसकी मौत ने हीरा को तोड दिया | ऐसा नही था के उसे अपनी पत्नी से बेहद प्यार था – सच बताएँ तो प्रेम का अर्थ भी नही जानता होगा वह्- पर हीरा के लिए उसकी बीवी उसे बेटा पैदा करके देने वाला यंत्र था, जो नही रहा| दूसरा ब्याह भी कर लेता वह्, और करने की कोशिश भी की थी, पर उस छोटे से गाँव मे कोई भी उस कठोर, बदसुरत देहाजु को अपनी बेटी देने को तय्यार नही था | हाँ, अगर रुपया हाथ होता तो शायद बात बन जाती, पर उस की कमी तो हीरा के लिय हमेशा से रही|

लाजवंती की परवरिश पडोस के घरों मे ही हुई| पर, उसके मन मे अपने पिता के लिए कभी भी द्वेष नही आया; अपनी आखरी साँसे गिनते हुए उसकी माँ ने उससे कहा था, “बेटी, बापू का हमेशा ख्याल रखना, नही तो वह खत्म हो जाँवेंगे |” यह जानते हुए के उस्के बापू उससे बेइंतहा अप्रीति रखते है , फिर भी वह उनका पूरा ध्यान रखती, अपना अटूट फ़र्ज़ समझ कर|

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महुआ लाजवंती की गहरी सहेली थी; पक्के रंग, छोटा कद्-काठ और धीर स्व्भाव वाली महुआ, गली के दूजे छोर पर अपने माँ-बाप और छोटी बहन के साथ रह्ती थी| दो भाई जयपुर शहर मे काम करते थे| लाजवंती का काफी बचपन यहीं बीता था| अपने परिचित आँगन मे दाखिल हुई तो देखा के महुआ की बहन सज धज के बाहर जा रही थी; महुआ कोने मे बैठी चावल चुग रही थी, और उसकी माँ झाडू लगा रही थी|

“आओ बेटी,” महुआ की माँ ने मुस्कुराते हुए कहा, ” कैसी है तू?”

“राम राम जीजी,” महुआ की बहन ने भी स्वागत किया

“राम राम मासी ” लाजवंती बोली, और साथ ही उसने महुआ की ओर देखकर नमस्ते मे सर हिलाया| “सब ठीक है| कैसी हो चम्पा, जब से ठाकुर साहब की हवेली पे काम करने लगी हो दिखती नही हो”

“क्या करूँ, इतनी बडी हवेली मे काम ही जान ले लेता है”, चम्पा ने जवाब दिया|

वही, झाडू फेरते हुए उसकी माँ ने भी उसे उत्तर दिया, “ठीक तो तेरे लिय हमेसा ही होवे है| बापू से फिर झग्डा तो न हुआ न”

“आप तो उन्हे जानते हो, पानी के घड़े रास्ते मे टूट गए थे, इसिलिए नाराज़ थे आज- मेरे से भी कुछ न कुछ गड्बड हो ही जाती है…थोडा पानी मिलेगा”

इससे पहले कोई जवाब देता, महुआ की बहन बोल पडी, “माँ मै जाती हूँ, आने मे देर होगी” , यह कहकर वह बाहर निकल गई|

“चम्पा कहाँ चल दी?” लाजवंती ने पूछा|

महुआ की माँ ने झाडू कोने मे रखा, हाथ झाडे और बोली, “आज दावत है ठाकुर की हवेली पर, तो ठकुराईन ने दोबारा बुलाया है उसे, तू रुक मै थारे वास्ते पानी लाती हूँ|” वह घर के भीतर चली गई| लाजवंती ने महुआ को इशारा किया बाहर चलने के लिए| महुआ ने भौहे उठाईं, और प्रश्न की मुद्रा मे हाथ हल्का सा घुमाया|

लाजवंती ने उसे सब्र रखने का इशारा किया| तभी, महुआ की माँ लौट आईं और एक मटका लाजवंती के हाथ मे दे दिया|

“महुआ, तू क्या चावलों मे उलझी रहेगी, चल घर चल मेरा थोडा हाथ ही बँटादे” लाजवंती ने कहा|

महुआ ने माँ से इजाज़त ली, चावलों का थाल उन्हे थमाया, और दोनो लड्कियाँ वहाँ से चल दीं| निकलते ही, लाजवंती ने कहा, “पहले बाजार चल ले, नए घड़े ले लूँ |” और सुविधाजनक्, मट्के को अपने कमर के सहारे रख कर पकड लिया| बाज़ार का रस्ता दोनो के घरों से बीचो बीच उत्तर की तरफ से था|

“क्यों बुलाया?” महुआ ने पूछा

लाजवन्ती थोडी दुविधा मे थी के महुआ को आज के किस्से के बारे मे बताए के नही| वैसे तो वह महुआ से कोई भी बात नही छिपाती थी, पर अभी उसे कुछ झिझक महसूस हो रही थी – उसे लगा के अगर वह यह बात बताएगी तो शायद यह भी मुँह से निकल जाएगा के उसको उस आदमी, जिसे क्षण भर से ऊपर देखा भी न था, के प्रति एक आकर्षण ज्ञात हुआ| और सम्भव है के यह उसी का कोई दोष हो के उस व्यक्ती ने वो हरकत की |

लेकिन सच यह भी था के , उस युवक को देखकर एक उम्मीद सी जागी थी – जब पिछली बार शाहर मे सिनेमा देखा था , तो एक हल्का सा सप्ना जगा था के शायद उसका भा कोई नायक आएगा, उस युवक को देखकर मनमे वही सपना फिर करवट ले रहा था

“ऐसे ही, मन घबरा रहा था, बापू ने फिर आज कोसा” लाजवन्ती ने झूठ कहा|

“लै, बस? इसमे कौन्सी नई बात है, मै सोचुँ कि तू कोई तीखी खबर लाई होगी,” महुआ ने हाथ हिलाते हुए कहा|

“अरे कहाँ, आज तो अपनी खबरी गंगा काकी भी नही थी कुँए पे – पर यह बता, यह हवेली मे दावतों का के चक्कर है? अभी पिछ्ले सप्ताह भी तो हुई थी,”

“अपने बापू की बेटी, कभी घर से बाहर भी झांक के देखा कर | एक माह पहले, ठाकुरसां का बेटा आया है दिल्ली से पढाई कर के, उसी के लिए है यह सारी दावते”

दोनो, बाज़ार की गली मे मुडीं |

“देखने मे कैसा है?” लाजवन्ती ने जल्दी से पूछा| कहीं आज वह तो नही था?

“देखा तो नही, पर सुना है बडा ही सुहावना है, आँखे भूरी, घुँघराले बाल, लम्बा कद्”

लाजवंती की साँस हलक मे अटक गई| हो न हो यह वही शख्स था| बरबस ही उसके होठो से एक निराशाजनक आह निकल आई|उसका मन बुझ गया; ठाकुरों के बुरे किस्सो के बारे मे बहुत सुना था; और फिर दोनो का मेल कहाँ? ठाकुर का बेटा तो वह सपनो का राजकुमार कभी नही हो सकता|

“क्यों री, तन्ने के हुआ?”

अपनी नादानी ढकते हुए, लाजवन्ती तुरंत बोली, “देख वह राजू और उसकी टोली फिर खडे है|”

महुआ ने तिरस्कृत निगाह से आगे देखा| कहने को तो यह बाज़ार था, पर सिर्फ नाम भर का – आठ दस दुकाने थी गली के एक ओर जिनके सामने था एक टूटा-फूटा सा प्राथमिक विद्यालय और गाँव का डाक घर| गली के बीचो-बीच एक विशाल पेड था, नीचे जिसके विश्राम करने के लिए थडा था| वहीं, राजू और उसके चार-पाँच दोस्त, बैठे ठिठोली करते अक्सर पाए जाते थे| लफँडरों की टोली ही थी उनकी, सब परेशान उनसे, पर कोई कुछ बोले कैसे, बेशर्मों के आडे आना अपनी उपर ही कीचड उछालना जैसे होता है| खेद की बात तो यह थी के राजू हीरा के दारू बाज़ दोस्त राम सरण का बेटा था, और लाजवँती के सँग तो छतीस का आँकडा था| कहने को तो वह सब ज़िला-प्रमुखालय के करीब किसी कारखाने मे काम करते थे, पर, पाए वह अधिक्तर यहीं जाते -सुनने मे आया के कारखाने मे हडताल कराने मे उनका काफी योगदान था|

दोनो लड्किया सर झुका कर वहाँ से गुज़रने लगी, पर राजू उन्हे देख चुका था|

“क्यों री, लाज्जो कब तक यह पहाड सी जवानी अकेले ही ढोएगी?” राजू ने व्यंग्य कसा | लाजवंती का मन तो हुआ उसे चांटा मारने का, पर कुछ न कहते हुए उस्ने कदम तेज़ कर लिए|

राजू इतनी जल्दी थोडे ही छोड्ता, आगे वास्ना भरे स्वर मे बोला, “हाय्, कहीं घड़े से कमर लचक न जाए |” उनका कोई जवाब न पाकर, उसका हौंसला और बुलंद हुआ, और आगे कदम करके उनके सामने खडा हो गया; पीछे उसके दोस्त मज़ा लेते हुए उसे प्रोत्साहन दे रहे थे, “सुन तो लाजो, ऐसी भी क्या नाराज़्गी के बात भी न करे है हमसे”

“रास्ता छोड दे” लाजवंती ने निम्न आवाज़ मे कहा|

“रास्ता छोड दूँ तो क्या तेरा हाथ थाम लूँ?”

“देख राजू मै बापू से कह दूँगी”

इस पर राजू ने ज़ोर सा ठहाका लगाया, जिस्की गूँज उसके यारों की हँसी बन के आयी|

“थारो बापू तो म्हारे ही घेर मे धुत पड़यों है | उसका बस चले तो तन्ने म्हारी जोरू बना दे; यह तो म्हारो बापू है जो अडे हुए है, आखिर दस्वीं पास छोरे है कितने गाँव मे, कीमत तो अदा करनी पड़ेगी न”

लाजवंती का पारा चढ रहा था| महुआ ने किनारे से खीन्चते हुए कहा, “चल ना” , और उसकी बाह पकड के आगे बढी|

दोनो दो कदम ही चले होंगे के पीछे से फिर राजू की आवाज़ आई, ” ऐ लाजो, सुना है आज-कल बड़े शहर से सेठ लोग आवे हैं| यहाँ की छोरिया उन्हे उन्हें खूब भाती है, तू कहे तो थारो ब्याह करा दूँ किसे एक के साथ”

लाजवंती के कदम जम गए| उसकी हालत रोने जैसी थी; हल्के से वह काँप रही थी; अपने अंदर अपमान और शर्म का लावा फूट रहा था| महुआ ने उसे खींचा, पर इससे पहले वह चल पाते, राजू बोला, “पण अगर सेठ ना भाए तो फिकर न कर, जब चाहे रात मा म्हारे पास आ जाना, मजा कराऊँगा” उसकी आवाज़ लोभ से लिप्त थी| उसके दोस्तों ने फिर एक ठहाको का दौर छोड़ा|

लाजवंती का सब्र टूट गया; वह् मुडी, आगे बढी, एक बाँह से गगरी सम्भाली और राजू के आगे थूकी|“समझ गयो के तू म्हारे माटे के है? मर जाऊँगी पर थारे पास, कभी नही” वह तिरस्कृत दृष्टि से राजू को देख रही थी| राजू के दोस्त चुप पड़ गए| राजू दंग खड़ा था, एक क्षण बाद बोला, “साली कमीनी…”

महुआ परेशान थी,और लाजवंती को ज़ोर से खींचने लगी, “अब चल यहाँ से, तू भी कहाँ उसके मुँह लगती है|” दोनो वहाँ से भाग निकली, लेकिन राजू की आवाज सुनाई दी, धमकाते हुए,” देख लूँगा मै”

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सारे रास्ते महुआ उसे डाँटती रही, “क्या ज़रुरत थी तुझे उससे उलझने की, तू जानती है वो कैसा कमीना है, किसी भी हद्द तक जा सकता है” लाजवंती खामोश रही, यह सब उसे पता था, अब हो गया; उस वक्त गुस्सा केवल राजू पर तो न था – अपने ऊपर , ठाकुर के बेटे, बापू और अपनी किस्मत्- सभी पर था| वह ही निकल आया|

महुआ तो चली गई, हीरा फिर दारू पीकर ही आया | हर रात की तरह लाजवंती अकेली ही तारो को निहारती रही, और यह सवाल करती रही के क्या कुछ बदलेगा? और उसका जवाब अगले दिन मिला; उसी जगह्, उसी समय | इस बार वह सतर्क थी तो आते देख लिया|

“कैसी है?” उसने पूछा; लाजवंती ने एक निगाह डाली उसकी तरफ पर बिना रुके चलती रही|

“मुझसे बात नही करोगी??” वह साथ साथ आने लगा| लाजवंती का दिल ज़ोर से धड़क रहा था; वह तो साथ ही चला आ रहा था; उसने चारों ओर नज़र घुमाई, कोई था नही आस पास मे, लेकिन कभी भी कोई आ सकता था|

” अरे कुछ तो बोलो,” छोटे ठाकुर ने मिन्न्त करते हुए फिर कहा

“आप ठाकुरसां के बेटे है, किसीने आपको म्हारे साथ देख लिया गजब हो जाएगा” लाजवंती ने कसे हुए स्वर मे कहा|

“क्या तुमसे बात करना कोई गुनाह है? और मुझे बताओ बात नही करेंगे तो दोस्त कैसे बनेंगे हम?”

दोस्त्? लाजवंती के मन ने उपहास किया ; उसे करीब पाकर मन मे कौतुहूल उठ रहा था| घबरा कर वह मंद ध्वनि मे बोली, “आप जाईए| आपके वास्ते म्हारी परछाईं छूणा भी पाप है”

उसकी चाल धीमी हो गयी थी , मानो कोई अन्जानी डोर उसे बाँध कर रोक रही थी | इससे छोटे ठाकुर का हौस्ला बुलंद हुआ, “यह किस सदी की बातें है, मै नही मानता इन्हे?”

लाजवंती के मन मे कई जवाब उठे पर होठों तक न आ पाए; वह माने न माने, सारा गाँव तो मानता ही था; खुद बड़े ठाकुरसां इस बात को बखूबी मानते होंगे| छोटे ठाकुर की इस बात से, और साथ चलते हुए पाकर अब एक खीज सी उठ रही थी लाजवंती के भीतर|

“मेरा यकीन करो ऐसे किसी को रेगिस्तान मे रोक कर बातें करना मेरी आदत नही| पर तुम्हारे साथ एक खिंचाव है जो मुझे मजबूर कर रहा है| मै दिल्ली मे रहा हूँ, एक से बढ्कर एक लड्की से मिला हूँ, पर तू कुछ अलग ही है| तुम्हे देखकर लगता है जैसे मेरी तलाश पूरी हुई है|”

लाजवंती को ठीक से समझ नही आ रहा था कि छोटे ठाकुरसा क्या कह रहे थे, पर इतना उसे पता था कि यह सब ठीक नही हो रहा था, और ठाकुरसा के इस बर्ताव के कारण गुस्सा उभर रहा था – और वह छ्लक आया जब उन्होंने ने अचानक उसकी बाँह थाम ली और कहा, “तुम सुनो तो, कुछ बोलो तो”

लाजवंती का रोम रोम अब रोष से भर गया | अपनी बाँह छुडाते हुए, अपनी नम होती आँखो से उसने छोटे ठाकुर को घूरा; गुस्से से उसकी साँसे फूल रहीं थी |

वह चलने ही वाली थी के छोटे ठाकुर उसका गुस्सा भाँप कर बोला,” माफ कर दो, मेरा गलत मतलब नही था| शायद हम बातें करें तो दोस्त बन सकते हैं… शायद उससे कुछ ज़्यादा भी…शायद प्यार…”

यह सुनकर लाजवंती की आँखें फैल गई| घृणा से उसने कहा, “प्यार?”

कितनी आसानी से यह् बडे लोग इस को कह देते है| जिसे वह प्यार कह रहा है वह सिर्फ आँखो की लालच ,जिस्म की चाह तो है | वह मुझे जानता ही कितना है के प्यार कर बैठा| क्या हूँ मै, मेरा जीवन्, मेरा दिल, मेरे अरमान, मेरे रहने का ढंग्…कुछ भी तो नही जानता वह, और प्यार की बात करता है!

गुस्से का वेग तेज़ी से उमड़ रहा था; अंदर से वह जैसे जल रही हो| और जैसे जैसे वह शोले भीतर भड़क रहे थे, वैसे वैसे वह साथ मे अंदर ही अंदर टूट भी रही थी|

“मेरा मतलब्…”

अपने अंदर फैले तपिश को अपने सारे साहस के साथ वश मे करने की कोशिश की, पर फिर भी उसकी जुबान से निकल ही आया, “आपका सब मतलब समझती हूँ | जानती हूँ आप जब चाहे मुझे खरीद सकते हो, पण मै बिकने वाली नही, न आपके प्यार के नाटक मे फँसणे वाली हूँ |” एक एक शब्द ऐसा था के जैसे लोहार की भट्टी से निकल कर आया हो|

“पर मेरा ऐसा…”

“आप प्यार की बात करते हो पर मेरा नाम तक तो नही जानते,” लाजवंती जितनी तेज़ी से शब्दों के तीखे तीर चला रही थी, उतनी जोश से उस की आँखे अँगारे बरसा रहीं थी| छोटे ठाकुर, उसके शब्दों के प्राहर तले दबा हताश खडा था| दोनो की आँखे पल भर के लिय टकराई| फिर झटके से मुड कर लाजवंती तेज़ी से चलने लगी| मन में अगन थी, और रह रह कर वहाँ से हूक उठ रही थी|

पीछे से छोटे ठाकुर की आवाज़ आई, “लाजवंती”

क्रमशः

5 Responses to “Tapish”

  1. anks Says:

    first!

  2. Deepak Jeswal Says:

    ANKS Welcome hai ji :)

  3. anks Says:

    read it… again a very graphic description…. but like i said before, not wowifying…. see, when you write one story after another, you raise the bar and in every new story your audience expects you to surpass the last….

  4. anks Says:

    thank you ji :D

  5. wsrhtrytui Says:

    Here are some links that I believe will be interested

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